ताराबाई भोसले का जीवन परिचय व इतिहास | Tarabai Bhosale Biography & History in Hindi

ताराबाई भोसले (अंग्रेजी: Tarabai Bhosale) छत्रपति राजाराम प्रथम की पत्नी थी। वह मराठा साम्राज्य के संस्थापक महान छत्रपति शिवाजी महाराज की बहू थी क्योंकि राजाराम प्रथम छत्रपति शिवाजी महाराज के दूसरे बेटे थे। परंतु, ताराबाई जब 5 वर्ष की थी उस समय में शिवाजी महाराज का देहांत हो गया था। 

ताराबाई का परिचय (Introduction to Tarabai)

नामताराबाई (Tarabai)
जन्मअप्रैल 1675, महाराष्ट्र, भारत
पिताहंबीरराव मोहिते
पतिछत्रपति राजाराम प्रथम
पुत्रशिवाजी द्वितीय
पोताराजाराम द्वितीय
ज्येष्ठ छत्रपति संभाजी महाराज
भतिजाछत्रपति शाहू महाराज
भुआसोयराबाई
ससुरछत्रपति शिवाजी महाराज
साससोयराबाई
धर्महिन्दू
वंशमराठा
प्रसिद्धि का कारणछत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र राजाराम की एक पत्नी
मृत्यु1761, सतारा, महाराष्ट्र (भारत)
जीवनकाल85-86 वर्ष
ताराबाई भोसले का जीवन परिचय व इतिहास | Tarabai Bhosale Biography & History in Hindi

ताराबाई भोसले का जन्म अप्रैल 1675 को महाराष्ट्र, भारत में हुआ था। उनके पिता हंबीरराव मोहिते, मराठा साम्राज्य के मुख्य सेनापति थे जिन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज तथा छत्रपति संभाजी महाराज दोनों के शासनकाल के समय में सेनापति होने का मौका मिला।

ताराबाई की एक बुआ सोयराबाई थी जिनका विवाह छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ हुआ था‌। उनकी बुआ का 1 पुत्र था जिसका नाम राजाराम था।

हंबीरराव ने अपनी पुत्री ताराबाई का विवाह शिवाजी महाराज के पुत्र राजाराम के साथ कर दिया जो उन्हीं का भांजा था। अर्थात मामा ने अपनी पुत्री का विवाह अपने भांजे के साथ कर दिया।

ताराबाई व राजाराम भोसले के पुत्र का नाम शिवाजी द्वितीय था जिसको राजाराम की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य की राजगद्दी पर बिठाया गया था। 

ताराबाई भोसले
ताराबाई भोसले

ताराबाई ने अपने पुत्र को मराठा राजगद्दी पर बिठाया (Tarabai Made Her Son the Successor of Marathas)

राजाराम द्वितीय को मुगलों ने बंदी बना लिया तथा मार्च 1700 में उसकी हत्या कर दी। अब ताराबाई विधवा हो गई थी। 

1689 में मुगलों ने उनके ज्येष्ठ संभाजी महाराज को भी मार डाला था। उन दोनों की शहीदी के बाद, मराठा साम्राज्य की राजगद्दी सुनी हो गई। तो ताराबाई ने अपने छोटे से बच्चे शिवाजी द्वितीय को मराठों का छत्रपति घोषित किया तथा उसे राजगद्दी पर बिठाया दिया।

शिवाजी द्वितीय ने 1700 से लेकर 1707 तक मराठा साम्राज्य पर शासन किया था।

मराठों पर मुगलों के आक्रमण 1700-1707 तक (Mughals’ Attacks on Marathas)

ताराबाई ने अपने पुत्र को राजगद्दी पर तो बिठा दिया था परंतु वह एक बच्चा था उसे पढ़ना लिखना तक नहीं आता था। तो अप्रत्यक्ष रूप से पूरे शासन की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ गई। ‌

उधर औरंगजेब के आदेशों पर मुगल सेना मराठों के हर एक क्षेत्र पर आक्रमण कर रही थी। जिसके बाद मराठों की इस लड़ाई का चार्ज ताराबाई ने अपने ऊपर ले लिया तथा मुगलों के साथ युद्ध किया।

1705 में मराठा सेना ने नर्मदा नदी को पार करते हुए मालवा क्षेत्र पर चढ़ाई कर दी। 1706 में मुगल सेना ने ताराबाई को पकड़ लिया। परंतु वह 4 दिनों के अंदर ही वहां से निकल कर वापस महाराष्ट्र आ गई।

वह (Tarabai) बहुत समझदार व बुद्धिमान स्त्री थी। वह एक मुगल सैनिक को रिश्वत देकर के वहां से बाहर निकलने में कामयाब हो गई। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपने हाथ के कड़े दिए थे जिनकी अनुमानित कीमत 10 मिलियन रुपए से भी ज्यादा थी।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। जिसके बाद मुगलों की तरफ से मराठों के क्षेत्रों पर आक्रमण भी बंद हो गए।

ताराबाई का शाहू महाराज के साथ विवाद (Tarabai’s dispute with Shahu Maharaj)

1707 में ही संभाजी महाराज के पुत्र शाहू महाराज को मुगलों ने कुछ शर्तों के साथ रिहा कर दिया। दरअसल, मुगल मराठों को दो भागों में बांटना चाहते थे। 

शाहू महाराज अभी तक जेल में थे और वहां पर उन्होंने 18 वर्ष बिताए थे। बाहर उनकी चाची ताराबाई व उनका पुत्र शिवाजी द्वितीय मराठा राजगद्दी पर अधिकार करके बैठे थे। जेल से रिहा होने के बाद, शाहू ने ताराबाई व उनके पुत्र को राजगद्दी से हटा दिया। 

इसके बाद ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के साथ कोल्हापुर में एक दरबार अलग से बनाया। इस दरबार को भी राजाराम की दूसरी विधवा पत्नी राजसबाई ने स्थगित करवा दिया और अपने पुत्र संभाजी द्वितीय को शासक माना। 

परंतु उधर, सभी पेशवा व मंत्रियों ने शाहू महाराज को पहले से ही मराठा साम्राज्य का छत्रपति मान लिया था।

1726 में शिवाजी द्वितीय की मृत्यु हो गई, जिसके बाद ताराबाई (Tarabai) शाहू महाराज के पास अपने पोते राजाराम द्वितीय के साथ आ गई।

ताराबाई व पेशवा बालाजी बाजीराव का विवाद (Controversy between Tarabai and Peshwa Balaji Bajirao)

ताराबाई जब अपने पोते राजाराम द्वितीय के साथ शाहू महाराज के पास गई थी। तो उन्होंने सारी घटनाएँ सत्यता से शाहू महाराज को बताई, जिसके बाद महाराज ने राजाराम द्वितीय को गोद ले लिया तथा अपना पुत्र मान लिया। 

1749 में शाहू महाराज की मृत्यु हो गई थी। उसके बाद राजाराम द्वितीय मराठों के अगले छत्रपति घोषित किए गए। अब तक ताराबाई उन्हें अपना पोता कहते हुए आई थी।

परंतु, एक दिन राजाराम द्वितीय के साथ उनका झगड़ा हो गया जिसकी वजह से ताराबाई ने यह घोषणा की कि राजाराम द्वितीय उनके पोते नहीं है, वह उन्हें जानती तक नहीं है। उन्होंने तो शाहू महाराज के यहां शरण पाने के लिए उसे अपना पोता झूठे ही बताया था।

असल में राजाराम द्वितीय छत्रपति नाम के थे, सारे शक्ति व निर्णयों का अधिकार पेशवा व ताराबाई के पास थे।

पेशवा बालाजी बाजीराव ने ताराबाई की सेना को हरा दिया तथा उनको राजाराम द्वितीय को छोड़ने के लिए कहा। ताराबाई के सैनिकों ने राजाराम द्वितीय को बंदी बनाकर रखा था। वहां पर उनकी शारीरिक व मानसिक स्थिति खराब हो रही थी।

जिसके बाद पेशवा व बाई (Tarabai) के मध्य पुणे में एक संधि हुई। इस संधि के मुताबिक ताराबाई शांति बनाए रखेंगी तथा राजाराम द्वितीय को मुक्त करेगी। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राजाराम द्वितीय उनका पोता नहीं है।

पेशवा ने राजाराम द्वितीय को फिर से मराठा साम्राज्य की राजगद्दी पर बिठा दिया। परंतु, हमेशा की तरह राजाराम सिर्फ एक निःशक्त शासक ही थे।

ताराबाई की मृत्यु (Death of Tarabai)

ताराबाई भोंसले की मृत्यु 1761 में महाराष्ट्र के सतारा के किले में हुई थी। उन्होंने लगभग 85-86 वर्षों का जीवन जिया जिसमें कई सारे उतार-चढ़ाव देखे।

उन्होंने दुविधा के समय में मराठा साम्राज्य को अपने हाथों में ले करके उसे पतन से बचाया।‌ पति राजाराम प्रथम की कम उम्र में ही मृत्यु हो जाने पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 

उनके अंतिम जीवन में कुछ असामान्य घटना घटित हुई थी। उन्होंने राजाराम द्वितीय को पहले अपना पोता माना तथा बाद में उसे पहचानने से इंकार कर दिया। इस तरह की घटनाएं हमें असमंजस में डाल देती हैं।

FAQs

राजाराम की मृत्यु कैसे हुई थी?

राजाराम की मृत्यु मार्च 1700 में हुई थी क्योंकि मुगलों ने उन्हें मार डाला था। उस समय का मुगल शासक औरंगजेब एक निर्दई शासक था जिसने राजाराम की हत्या करवा दी थी। वह शिवाजी महाराज के वंश को खत्म करना चाहता था।

ताराबाई की मृत्यु कब हुई थी?

1761 में सतारा के किले में।

ताराबाई ने कौन से महान कार्य किए थे?

ताराबाई ने 1700 लेकर 1707 तक मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली जो कि उनका एक महानतम कार्य था क्योंकि उस समय मुगल मराठा साम्राज्य को खत्म करना चाहते थे परंतु ताराबाई ने अपने कार्य से शासन की नियम को मजबूत बनाए रखा।

ताराबाई के पुत्र का क्या नाम था?

शिवाजी द्वितीय।

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