तात्या टोपे जी का जीवन परिचय व इतिहास (2022) | Tatya Tope Biography in Hindi |

तात्या टोपे (16 फरवरी 1814 – 18 अप्रैल 1859) जिन्हें ताँत्या टोपे भी कहा जाता है। वे 1857 की क्रांति के प्रमुख और अग्रणी सेनानियों में से एक थे। तात्या टोपे जी एक महान और वीर देशभक्त थे जो गुलाम भारतवर्ष को आजाद कराना चाहते थे। उनका व्यक्तित्व आज भी हमारे लिए एक मिसाल है।

Tatya Tope image
तात्या टोपे (Tatya Tope)

तात्या टोपे का परिचय (Introduction to Tatya Tope)

नामतात्या टोपे (Tatya Tope)
वास्तविक नामरामचंद्र पांडुरंगा यावलकर / रामचंद्र पांडुरंगा भट्ट
जन्म16 फरवरी 1814, येवला, नासिक के नजदीक, महाराष्ट्र (भारत)
मातारुकमाबाई
पितापांडुरंगा राव टोपे
परिवारब्राह्मण
धर्महिंदू
आंदोलन1857 की क्रांति में योगदान
मृत्यु18 अप्रैल 1859,  शिवपुरी, मध्य प्रदेश (भारत)
स्मृति स्थलतात्या टोपे शहीद स्मारक, मध्य प्रदेश
जीवन काल45 वर्ष
तात्या टोपे जी का जीवन परिचय (Tatya Tope biography in Hindi)

तात्या टोपे जी का जन्म 16 फरवरी, 1814 को येवला (महाराष्ट्र में एक गाँव) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पांडुरंगा राव टोपे और माता का नाम रुकमाबाई था। वे अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता पांडुरंगा राव बिठूर के पेशवा मराठा बाजीराव द्वितीय के दरबार में एक रत्न थे।

उस समय तात्या टोपे पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहेब के साथ रहते और उनके साथ खेला करते थे। वे एक दूसरे के पक्के मित्र थे। वे अब बिठूर में ही रहा करते और नाना के साथ ही कच्चे युद्ध किया करते। उन्हें बचपन से ही तलवार, बंदूक इत्यादि का बहुत शौक था।

तात्या टोपे, नाना साहेब और मणिकर्णिका बिठूर में ही पले-बढे। अस्त बाजी, तलवारबाजी, तीर कमान इत्यादि ही उनके मुख्य खेल हुआ करते थे। तात्या हमेशा से ही एक गर्म स्वभाव के योद्धा थे। वे चक्रव्यूह, युद्ध कौशल, सेना नेतृत्व में बहुत होशियार थे।

1857 की क्रांति में नाना साहेब और तात्या टोपे (Nana Saheb and Tatya Tope in Rebellion of 1857)

5 जून 1857 को कानपुर में क्रांति की शुरुआत हो गई थी। उस समय नानासाहेब क्रांति का नेतृत्व कर रहे थे। उनके नेतृत्व में 25 जून 1857 को ब्रिटिश सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। जून महीने के अंत में नानासाहेब को पेशवा घोषित कर दिया गया।

जनरल हैवलॉक ने नाना साहेब की सेना का दो बार सामना किया और तीसरी बार में नाना की सेना को हरा दिया। नाना की हार के बाद उनके सैनिकों को बिठूर वापस जाना पड़ा। उस दौरान तात्या बिठूर में नाना के नाम से कार्यभार संभाल रहे थे।

 27 जून 1857 को कानपुर में हुए हत्याकांड में तात्या टोपे की मुख्य भूमिका थी। इसके बाद तात्या 16 जुलाई 1857 तक पूरी तरह सुरक्षित रहे और कोई आक्रमण नहीं किया। इसके बाद तात्या ने फिर जनरल चार्ल्स को कानपुर की जंग में हरा दिया।

यह जंग 19 नवंबर 1857 को शुरू हुई थी और 17 दिन तक चली। इस जंग के बाद उनकी सेना को कोलिन कैंपबेल ने हरा दिया और तात्या को अब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के यहां ठहरना पड़ा।

तात्या के द्वारा झांसी को मदद और ग्वालियर की जंग (Help by Tatya Tope to Jhansi and the Fight of Gwalior)

जनवरी 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में क्रांति की शुरुआत कर दी थी। झांसी के किले को अंग्रेजों ने घेर रखा था। अंग्रेजों के मुताबिक झांसी के पास अपना कोई उत्तराधिकारी नहीं था क्योंकि झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो चुकी थी तो झांसी का शासन अब ब्रिटिश सरकार का हो गया था।

जबकि यह बात रानी लक्ष्मीबाई को कतई मंजूर नहीं थी। उन्होंने झांसी देने से साफ इनकार कर दिया। रानी ने तात्या टोपे से मदद मांगी क्योंकि वह तात्या टोपे की शिष्या थी और वह बिठूर में उनके यहां रहती थी। तो तात्या टोपे ने झांसी की तरफ अपनी सेना भेजी परंतु वह सेना अपने मकसद में सफल नहीं हो सकी।

अंग्रेजों ने अपनी युद्ध नीति से रानी लक्ष्मीबाई को झांसी से बाहर निकाल दिया। तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई अब ग्वालियर के किले में आ गए और वहां पर अपनी सेना बनानी शुरू कर दी। इस सेना का नेतृत्व रावसाहेब (नाना साहेब के पुत्र) कर रहे थे जो इतनी कुशल युद्ध नीति नहीं जानते थे तो तात्या टोपे ने सेना का नेतृत्व संभाला।

अब जून 1858 में अंग्रेजों ने ग्वालियर के किले पर आक्रमण कर दिया। इस जंग में 18 जून, 1858 को रानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गई और उनके साथी सैनिक भी शहीद हो गए। रानी लक्ष्मी बाई के पुत्र दामोदर राव वहां से बचकर भाग गए।

ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला

क्रांति के बाद भी तात्या ने जारी रखे आक्रमण (Tatya Continued Attacks After 1857 Rebellion) 

ब्रिटिश सरकार ने 1857 की क्रांति को दबा दिया था। परंतु, तात्या टोपे कहां रुकने वाले थे। उनकी युद्ध नीति बहुत तेज थी और वे अंग्रेजों पर गुरिल्ला लड़ाकू की तरह आक्रमण करते रहे। टोपे अपनी सेना जब इंदोर ले जा रहे थे तो अंग्रेजो ने उन्हें रोक लिया। 

इस बार अंग्रेज सेना जॉन माइकल के नेतृत्व में थी, परंतु तात्या टोपे जानते थे कि अब युद्ध न करके सिरोंज की तरफ जाना चाहिए। तो वह कैसे भी करके सिरोंज चले गए जहां वे नानासाहेब से मिले। उन्होंने एक योजना बनाई कि तात्या के पास बड़ी सेना है तो वे चंदेरी चले जाएंगे और नाना साहेब के पास छोटी सेना है तो वे झांसी चले जाएंगे।

उन्होंने अपनी सेना को दो भागों में बांट लिया परंतु उन्हे अक्टूबर में अपनी सेना को दोबारा इकट्ठा करना पड़ा और इसके बाद वे छोटा उदयपुर में अंग्रेजों से जंग हार गए। अब जनवरी 1857 में तात्या जयपुर में आ गए। यहां पर भी उन्हें दो हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद तात्या जंगलों में अकेले रहने लगे और इस दौरान वे नरवर के राजा मानसिंह से मिले। तात्या मानसिंह पर विश्वास करते थे और उनके यहां रहने लगे। मानसिंह ग्वालियर के राजा से विवाद में था क्योंकि उनकी आपस में बनती नहीं थी। ग्वालियर के राजा तात्या टोपे के एकदम खिलाफ थे।

अंग्रेजों ने इस चीज का फायदा उठाया और मानसिंह को कहा कि आप तात्या टोपे को हमें सौंप दो जिससे ग्वालियर के राजा आपसे खुश हो जाएंगे। मानसिंह को यह बात अच्छी लगी और उन्होंने तात्या टोपे को अंग्रेजों को पकड़वा दिया।

तात्या टोपे जी की मृत्यु (Death Of Tatya Tope Ji)

ब्रिटिश सरकार तात्या टोपे को इतने लंबे समय से पकड़ने की कोशिश कर रही थी पर कभी सफल नहीं हो सकी थी। परंतु मानसिंह के विश्वासघात के कारण तात्या टोपे पकड़े गए। और पकड़े जाने के बाद तात्या ने अपने सारे गुनाह स्वीकार कर लिए।

अंग्रेजों ने 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में तात्या टोपे की हत्या कर दी। तात्या टोपे का स्मृति/शहीद स्मारक शिवपुरी, मध्य प्रदेश में बना हुआ है। तात्या टोपे भारतीय इतिहास में एक प्रतिभाशाली वीर योद्धा रहे हैं उन्हें देश के जवान आज भी याद करते हैं।

FAQs

तात्या टोपे की मृत्यु कैसे हुई थी?

तात्या टोपे को मानसिंह के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों ने उनको पकड़ लिया। बंधी बनाने के बाद अंग्रेजों ने तात्या टोपे को 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में फांसी दे दी।

तात्या टोपे को फांसी कब हुई?

18 अप्रैल 1859 को अंग्रेजों ने शिवपुरी में तात्या टोपे को फांसी लगा दी। तात्या टोपे को फांसी लगाने से पहले तात्या टोपे ने अपने सारे गुनाह कबूल कर लिए थे।

तात्या टोपे का जन्म कब और कहां हुआ था?

तात्या टोपे का जन्म 16 फरवरी 1814 को येवला (नासिक के नजदीक एक गांव) महाराष्ट्र में हुआ था। वह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे और उनके पिता पांडुरंगा राव बिठूर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के यहां दरबार में काम करते थे। तो उनके साथ तात्या टोपे भी बिठूर में ही रहने लग गए।

तात्या टोपे का मूल नाम क्या था?

तात्या टोपे का मूल नाम रामचंद्र पांडुरंगा यावलकर था जिन्हें कई इतिहासकार रामचंद्र पांडुरंगा भट्ट के नाम से भी जानते हैं। यह उनके जन्म का नाम था परंतु लोगों ने उनको तात्या टोपे के नाम से पुकारा। क्योंकि तात्या टोपे का मतलब होता है – एक प्रधान अधिकारी या एक प्रधान नेता। यह नाम तात्या के गुणों से मिलता-जुलता था।

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