चंद्रगुप्त द्वितीय का जीवन परिचय व इतिहास 2022 | Chandragupta II in Hindi

सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (अंग्रेजी: Chandragupta II) गुप्त वंश के पांचवे राजा थे। वह सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न था। पिता समुद्रगुप्त के बाद वह राजगद्दी पर बैठा। उसने गुप्त वंश की नींव को कमजोर नहीं होने दिया और एक शांति पूर्ण शासन का निर्माण किया। तो आइए जानते हैं चंद्रगुप्त द्वितीय का पूरा इतिहास (Biography and History of Chandragupta II in Hindi)।

चंद्रगुप्त द्वितीय का परिचय (Introduction to Chandragupta II)

नामचंद्रगुप्त द्वितीय (Chandragupta II)
जन्ममगध, भारत
मातादत्ता देवी
पितासमुद्रगुप्त
पत्नीध्रुवदेवी, कुबेरानाग
पुत्रकुमारगुप्त प्रथम, गोविंदगुप्त
पुत्रीप्रभावती गुप्त
दादाचंद्रगुप्त प्रथम
साम्राज्यगुप्त
धर्महिंदू
पूर्ववर्ती राजासमुद्रगुप्त
उत्तराधिकारी राजाकुमारगुप्त प्रथम 
शासन375 ईस्वी से 415 ईस्वी तक
उपाधिराजाओं का राजा, विष्णु का भक्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
मृत्यु415 ईस्वी, भारत (415 ई. अनुमानित वर्ष है)
Chandragupta II gold coin image - चंद्रगुप्त द्वितीय

चंद्रगुप्त द्वितीय का जन्म प्राचीन भारत के मगध राज्य में हुआ था। उसके पिता का नाम समुद्रगुप्त तथा माता का नाम दत्ता देवी था। पिता समुद्रगुप्त के बाद वह गुप्त वंश के राज सिंहासन पर बैठा।

चंद्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है। उसने अपने पिता समुद्रगुप्त के सारे गुण ग्रहण कर लिए थे। उसने अपने पिता के द्वारा जीते हुए दूसरे राज्यों व पूरे भारत में विस्तारित गुप्त साम्राज्य को अखंड बनाये रखा।

गुप्त वर्ण बताते हैं कि चंद्रगुप्त II की प्रथम रानी का नाम ध्रुवा देवी था जिनका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम था। और कुमारगुप्त प्रथम ही चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद गुप्त वंश का शासक बना था।

चंद्रगुप्त ने नागवंश की राजकुमारी कुबेरानाग के साथ भी विवाह किया था। कुबेरानाग और चंद्रगुप्त को एक पुत्री की प्राप्ति हुई जिसका नाम प्रभावती गुप्त था।

नागवंश के राजा, गुप्त वंश के सम्राट समुद्रगुप्त से पहले मध्य भारत पर राज करते थे। परंतु बाद में, समुद्रगुप्त ने नागवंश को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

जब चंद्रगुप्त ने शकों पर आक्रमण किया था तब नाग राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था जिससे वह शकों को पराजित कर पाया।

चंद्रगुप्त II के दादा का नाम भी चंद्रगुप्त (ना कि चंद्रगुप्त मौर्य) था जिनको इतिहास में चंद्रगुप्त प्रथम के नाम से जाना जाता है।

पारिवारिक सम्बंध (Family Relationships)

चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से किया। वाकाटक राज्य गुप्त साम्राज्य के दक्षिण के दक्कन का क्षेत्र था। कुछ वर्षों बाद, 390 इस्वी में रूद्रसेन की मृत्यु हो गई। अब प्रभावती अपने नन्हें पुत्र के राज्य-निरीक्षक के रूप में शासन संभालने लगी।

चंद्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाटक को अपने राज्य में मिलाकर उज्जैन को दूसरी राजधानी घोषित किया जिससे उसे समुद्री व्यापार से अन्य संसाधनों की प्राप्ति होने लगी। इन पारिवारिक संबंधों से उसे मजबूत सरंक्षण प्राप्त हो गया जिसके कारण वह (Chandragupta II) शकों पर विजय प्राप्त कर सका।

एक संस्कृत नाटक देवीचंद्रगुप्तम  में यह बताया गया है कि चंद्रगुप्त द्वितीय का एक बड़ा भाई था जिसका नाम रामगुप्त था। रामगुप्त ने पिता समुद्रगुप्त के बाद शासन की बागडोर संभाली। परंतु, चंद्रगुप्त ने उसको सिंहासन से हटा दिया और खुद राजा बन गया।

हालांकि नाटक की ये बातें विवादास्पद हैं। रामगुप्त के इतिहास की सटीकता और वास्तविकता का इस नाटक से कोई पता नहीं चलता है। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक यह सत्य है परंतु, कुछ इसे एक नाटक मात्र ही समझते हैं। 

चंद्रगुप्त द्वितीय का शासन (Reign of Chandragupta II)

इलाहाबाद के अभिलेख में बताया गया है कि चंद्रगुप्त के पिता समुद्रगुप्त को शक राजा मरून दास ने उसे प्रसन्न करने के लिए उपहार भेजे थे, जिससे समुद्रगुप्त ने शकों के राज्य पर आक्रमण नहीं किया।

परंतु चंद्रगुप्त ने विदेशियों को बाहर निकालना चाहा, जिनमें उसके मुख्य प्रतिद्वंदी पश्चिम के शक थे। मध्य, दक्षिण और पूर्व भारत में उसका पहले से शासन था, परंतु पश्चिम में उसका शासन था। 

चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया। उसने पश्चिमी भारत के शकों को पराजित किया और शक शासक रूद्रसेन तृतीय को हराया। शकों को हराने से गुजरात, मालवा और काठियावाड़ गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित हो गए। 

चंद्रगुप्त ने 397 ईस्वी और 409 ईस्वी के बीच में शकों के राज्य पर अधिकार कर लिया था। शकों के राज्य में चांदी के सिक्के चलते थे जो उनके अनमूलन के साथ ही नष्ट हो गए। शकों पर विजय प्राप्त करने की याद में चंद्रगुप्त ने चांदी के सिक्के जारी किए। 

 दिल्ली के लौह स्तंभ के अभिलेख में, चंद्रगुप्त द्वितीय को चंद्रा के नाम से भी जाना गया है। उसने पंजाब क्षेत्र पर मार्च करते हुए वर्तमान अफगानिस्तान और पूर्व में पश्चिम बंगाल तक अपनी सीमा को बढ़ाया।

चंद्रगुप्त द्वितीय का धर्म (Religion of Chandragupta II)

चंद्रगुप्त द्वितीय का धर्म हिंदू था। अभिलेख व सोने-चांदी के सिक्के पर उसे भगवान विष्णु का भक्त बताया गया है तथा उसे परम भागवत के नाम से भी पुकारते हैं।

 बयाना मुद्राभांड से प्राप्त सिक्कों पर उसे चक्रविक्रम के नाम से संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है – “वह जो सुदर्शन चक्र के कारण शक्तिशाली है।”

चंद्रगुप्त के विदेश-मंत्री वीरसेना के उदयगिरी अभिलेख में वर्णित है कि उसने (Chandragupta II)  भगवान शिव का मंदिर भी बनवाया था। ऐसे ही एक अन्य अभिलेख के अनुसार, उसने बौद्ध भिक्षुक को भी दान दिया था जिससे पता चलता है कि वह एकेला विष्णु का भक्त न होकर, उसने अन्य देवों की भी मान्यता रखी थी।

चीनी यात्री फाह्यान का आगमन (The Arrival of Chinese Traveller Faxian)

चीनी यात्री फाह्यान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन में भारत आया था। वह यहां लगभग 6 वर्षों तक ठहरा। उसने चंद्रगुप्त के शासन को शांति वादी व समृद्ध वादी बताया। उसने किसी भी तरह की चोरी या लूटपाट नहीं देखी जो संभवतया दूसरे चीनी यात्रियों ने महसूस की थी।

फाह्यान के अनुसार, मध्य भारत का शहर मथुरा एक बहु-जनसंख्या वाला शहर है, जहां लोग प्रसन्न और अमीर हैं। उनको अपने धन, वस्तुओं, भवनों के बारे में राजा को बताने की जरूरत नहीं है।

अपराधियों के लिए कोई कठोर शारीरिक सजा नहीं है बल्कि उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है। यह शुल्क अपराधी के कृत्य के आधार पर कम या ज्यादा हो सकता है। राजा के हर एक अधिकारी जैसे अंगरक्षक, दास, सैनिक इत्यादि सभी को वेतन दिया जाता था। 

 फाह्यान के मुताबिक, चांडालों के अलावा कोई भी मांस, अंडे, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन नहीं करता था। चंडालों को कोई भी नहीं छूता था। जब भी चांडाल किसी शहर या बाजार में आते थे तो वे एक ध्वनि से सभी को सचेत कर देते थे ताकि लोग उनके संपर्क में ना आए।

 चांडाल ही मांस मच्छी का लेनदेन किया करते थे। सामान्य बाजार में कोई भी कसाई खाना या शराब की दुकान नहीं होती थी। आमतौर पर लोग किसी भी तरह के पक्षी और सूअर नहीं रखते थे।

 लोग कोड़ियों से चीजों का लेनदेन करते थे। फाह्यान ने पाटलिपुत्र को सबसे धनवान शहर बताया है। बौद्ध धर्म के उत्सव में शहरों की गलियों से बड़ी धूमधाम से रथ निकाले जाते थे। किसी भी अहाय इंसान की प्राथमिक सुविधाओं के लिए शुल्क नहीं लिया जाता था।

चंद्रगुप्त द्वितीय के सोने सिक्के
चंद्रगुप्त द्वितीय के सिक्के
(Image source: https:/coinindia.com/Chandra-4808Bv-468.20.jpg)

चंद्रगुप्त द्वितीय के सिक्के (Coins of Chandragupta II)

चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपने पिता समुद्रगुप्त के जारी किए हुए सोने के सिक्कों को प्रचलन में रखा, जिनके मुख्य प्रकार ये हैं-  (Chandragupta II’s old gold coins issued by Samudragupta) 

  • धनुर्धारी
  • बाघ कातिल
  • राजदंड 

चंद्रगुप्त ने राजदंड सिक्कों को बहुत कम जारी किया क्योंकि वह एक शांतिप्रिय शासक था जो जनता को कष्ट नहीं देना चाहता था। 

चंद्रगुप्त द्वितीय के द्वारा जारी किए गए नए सोने सिक्के (Chandragupta II’s new gold coins) –

  • घुड़सवार
  • शेर कातिल

 इन सिक्कों को उसके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम ने अपने शासन में भी जारी रखा। इसके अलावा, चंद्रगुप्त ने शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद विशेष रूप से चांदी के सिक्के जारी किए। शकों के राज्य में चांदी के सिक्के पहले से चलते थे जिन पर उनके राज्य का प्रतीक बना हुआ था। चंद्रगुप्त ने उनके राज्य को राज्य के प्रतीक को हटा करके अपने राज्य के गरूड़ प्रतीक को बनवाया। ये सिक्के प्रायः शकों के सिक्कों जैसे ही हैं।

 इन सिक्कों पर चंद्रगुप्त द्वितीय (Chandragupta II) को “राजाओं का राजा”, “चंद्रगुप्त विक्रमादित्य”, “विष्णु का भक्त” बताया गया है।

चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु (Death of Chandragupta II)

लगभग 415 ईस्वी में  सम्राट चंद्रगुप्त II की मृत्यु हो गई। इसके बाद, उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम गुप्त वंश की राजगद्दी पर बैठा। चंद्रगुप्त (Chandragupta II) ने 375 ईस्वी से लेकर 415 ईस्वी तक लगभग 40 वर्षों तक प्राचीन भारत पर शासन किया। चंद्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि दी गई क्योंकि उसके कार्य व वीरता राजा विक्रमादित्य के जैसी थी।

अगर आप वीडियो देखना चाहते हैं तो नीचे दिये गये वीडियो पर क्लिक कीजिए और चंद्रगुप्त II का इतिहास देखिए।

चंद्रगुप्त द्वितीय का जीवन परिचय व इतिहास (Biography & history of Chandragupta II in Hindi)

बार-बार पूछे गए प्रश्न (FAQs)

चंद्रगुप्त द्वितीय को कौन सी उपाधि मिली थी?

सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि मिली क्योंकि उसने अपने कार्य से राज्य में शांति व समृद्धि बनाई।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य इतिहास में क्यों अमर है?

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने राज्य में शांति, समृद्धि, न्याय, एकता, बंधुता का निर्माण किया जिससे वह इतिहास में अमर बन गया।

चंद्रगुप्त मौर्य व चंद्रगुप्त द्वितीय में क्या अंतर है?

चंद्रगुप्त मौर्य, मौर्य वंश के संस्थापक व  प्रथम राजा थे जबकि चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के पांचवे राजा थे जिनका जन्म चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के बाद लगभग 700 वर्ष बाद हुआ था।

चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद राजा कौन बना था?

गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम राजा बना।

मुझे उम्मीद है दोस्तों, आपको गुप्त वंश के साथ चंद्रगुप्त द्वितीय (Chandragupta II) का इतिहास समझ में आया होगा। अगर आप का कोई प्रश्न या सुझाव है तो आप कॉमेन्ट करके बता सकते हैं।

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