कुमारगुप्त प्रथम का जीवन परिचय 2022 | Kumaragupta I Biography in Hindi

कुमारगुप्त प्रथम (अंग्रेजी: Kumaragupta I) प्राचीन भारत के गुप्त साम्राज्य का छट्ठा राजा था। वह अपने पिता चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद राजगद्दी पर बैठा। उसकी उपलब्धियों में से एक महान उपलब्धि यह थी कि उसने संभवतया नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। तो आज हम कुमारगुप्त प्रथम (Kumaragupta I) के इतिहास को जानेंगे तो चलिए शुरू करते हैं।

कुमारगुप्त प्रथम का परिचय (Introduction to Kumaragupta I)

नामकुमारगुप्त प्रथम
जन्म399 ईस्वी, प्राचीन भारत
माताध्रुवा देवी
पिताचंद्रगुप्त द्वितीय
पत्नीअनंता देवी
पुत्रस्कंदगुप्त,  पूरुगुप्त
दादासमुद्रगुप्त
दादीदत्ता देवी
धर्महिंदू
साम्राज्यगुप्त
पूर्ववर्ती राजाचंद्रगुप्त द्वितीय
उत्तराधिकारी राजा स्कंदगुप्त
शासन415 ईस्वी – 455 ईस्वी
उपाधि महाराजाधिराज, परम भट्टारका, परमद्वैता, महेंद्रादित्य
मृत्यु 455 ईस्वी, प्राचीन भारत 

कुमारगुप्त प्रथम गुप्त वंश का एक सम्राट था जिसका जन्म 399 ईस्वी में प्राचीन भारत में हुआ था। उसके पिता का नाम चंद्रगुप्त द्वितीय तथा माता का नाम ध्रुवा देवी था। अपने पिता के बाद उसने गुप्त वंश के शासन को संभाला और बहुत बड़ी संख्या में सोने की मुद्राएं जारी करवाई। 

चंद्रगुप्त द्वितीय के अंतिम अभिलेख 412 ईस्वी के हैं तथा कुमारगुप्त के  शुरुआती शिलालेख 415 ईस्वी के हैं जिससे पता चलता है कि लगभग 415 ईस्वी में कुमारगुप्त प्रथम गुप्त वंश के सिंहासन पर बैठा था।

ह्वेनसांग ने कुमारगुप्त का नाम शक्रादित्य बताया है। कुमारगुप्त ने खुद को महाराजाधिराज, परमभत्तारका, परमद्वैता, महेंद्रादित्य इत्यादि नामों से उपाधि दी परंतु उसके सिक्के उसे श्री महिंद्रा, महेंद्रसिम्हा और अश्वमेध महिंद्रा के नाम से भी संबोधित करते हैं। 

कुमारगुप्त प्रथम का जीवन परिचय

पारिवारिक जीवन

कुमारगुप्त प्रथम के 2 पुत्र थे – स्कंदगुप्त और पूरुगुप्त। स्कंदगुप्त के अभिलेख में उसकी माता का नाम नहीं बताया गया है। कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम की राजकुमारी अनंता देवी से हुआ था। उनका पुत्र पूरुगुप्त था।

भिटारी के अभिलेख बताते हैं कि कुमारगुप्त प्रथम ने अपने एक मंत्री की बहिन के साथ विवाह किया था। परंतु, उन्हें प्राप्त हुई संतान का कहीं जिक्र नहीं है।

कुमारगुप्त प्रथम का शासन (Reign of Kumaragupta I)

कुमारगुप्त प्रथम के राजा बनने से पहले से ही गुप्त साम्राज्य का लगभग पूरे भारत पर शासन था। उसके पिता चंद्रगुप्त द्वितीय और दादा समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य को एक विशाल साम्राज्य बनाया था।

कुमारगुप्त जब राजगद्दी पर बैठा था, उस समय गुप्त वंश की प्रसिद्धि आकाशों पर थी। वह शासन का विस्तार तो नहीं कर पाया परंतु शासन की प्रतिभा को बनाए रखा। उसके इतिहास के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश से कुछ अभिलेख मिले हैं जो उसके शासन के दौरान बनाए गए थे। बयाना-मुद्राभाण्ड से कुमारगुप्त की 623 सोने की मुद्राएं मिली है जिनसे पता चलता है कि उसने इतने बड़े साम्राज्य पर एक मजबूत शासन बनाए रखा।

उसके सिक्कों से यह भी पता चलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ करवाया था। अर्थात् उसके राज्य में कुछ युद्ध भी हुए थे। क्योंकि प्राचीन काल में राजा अपनी वीरता और महानता सिद्ध होने के बाद अश्वमेध यज्ञ करवाते थे। कुमारगुप्त ने युद्ध देवता कार्तिकेय की भी पूजा की थी। हालांकि इन सब बातों का भी कोई ठोस सबूत नहीं है।

कुमारगुप्त प्रथम (Kumaragupta I) ने 415 ईस्वी से लेकर 455 ईस्वी तक शासन किया अर्थात् वह 40 वर्षों तक गुप्त साम्राज्य का सम्राट रहा।

शासन का प्रबंधन (Governance Management)

अपने शासन के अंतिम समय में कुमारगुप्त को पुष्यमित्र या हूण जातियों के विद्रोह सामना करना पड़ा। ऐसा लगता था कि इस विद्रोह के बाद से ही गुप्त साम्राज्य  विघटन की ओर चला जाएगा।

परंतु कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने राजा बनने के बाद अपनी वीरता और शौर्य से हूणों को पराजित कर गुप्त वंश को भयंकर संकट से बताया।

कुमारगुप्त के साम्राज्य में मजबूत शासन प्रणाली थी जिसकी बदौलत वह इतने बड़े साम्राज्य को संभाल पाया। उसके राज्य में उपरिकस, भूक्तिस, विशयास और विश्यापति थे जो वर्तमान समय में क्रमशः गवर्नर, मुख्यमंत्री, कलेक्टर व मजिस्ट्रेट के समान पद थे। 

उपरिकस (गवर्नर) को महाराजा कहा जाता था जो शासन के कार्यभार व राज्यों से प्राप्त कर का हिसाब रखते थे। भूक्तिस (मुख्यमंत्री) हर एक राज्य एक ही होता था जो राज्य का शासन संभालता था। विशयास (कलेक्टर) राज्य के ही अंगों पर गौर करते थे और विश्यापति (मजिस्ट्रेट) अन्य नीचे स्तर के कार्यों की देखरेख करते थे।

कुमारगुप्त प्रथम का धर्म (Religion of Kumaragupta I)

कुमारगुप्त के सिक्कों पर गरुड़ का चिन्ह बना हुआ है जिससे पता चलता है कि वह भगवान विष्णु का परम भक्त था क्योंकि गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है। हालांकि, गुप्त साम्राज्य का राष्ट्रीय चिन्ह भी गरुड़ था जो उसके पूर्वजों ने अपनाया था।

इसके साथ ही वह कार्तिकेय का भी भक्त था। उसके सिक्कों पर कार्तिकेय को मोर पर बैठा हुआ दिखाया गया है। कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है जिसके कारण उसने अपने एक पुत्र का नाम स्कंदगुप्त रखा था और खुद का नाम “कुमार” रखा था।

उसके राज्य में बौद्ध, जैन, शैव और विष्णु विश्वास माने जाते रहे थे। वह (Kumaragupta I) खुद एक हिंदू था, उसके द्वारा किया गया अश्वमेध यज्ञ हिंदू धर्म का एक प्रमाण है।

कुमारगुप्त प्रथम के सोने के सिक्के
कुमारगुप्त प्रथम के सोने के सिक्के
(Image source: http://coinindia.com/)

कुमारगुप्त प्रथम के सिक्के (Coins of Kumaragupta I)

कुमारगुप्त प्रथम ने अपने शासन के वक्त बड़ी संख्या में सिक्के जारी किए। बयाना से 614 सिक्के मिले हैं उन सिक्कों के मुख्य प्रकार निम्न है-

  1. धनुर्धारी
  2. घुड़सवार 
  3. तलवारधारी
  4. शेर कातिल
  5. बाघ कातिल
  6. हाथी सवार
  7. हाथी सवार-बाघ कातिल
  8. गैंडा कातिल
  9. अश्वमेध
  10. छत्र
  11. अप्रतिघा
  12. गीतिकाव्यकार
  13. राजा और रानी

इन सिक्कों पर कुमारगुप्त प्रथम को भिन्न-भिन्न उपाधियां दी गई है जैसे श्री महिंद्रा, महेंद्र सिम्हा, अश्वमेध महिंद्रा इत्यादि।

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु (Death of Kumaragupta I)

संभवतया कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु प्राचीन भारत में 455 ईस्वी में हुई थी। स्कंदगुप्त के अभिलेखों में बताया गया है कि स्कंदगुप्त 455 इस्वी में गुप्त साम्राज्य की राजगद्दी पर बैठा। जिसका मतलब है कि कुमारगुप्त ने उसी वर्ष या उससे पहले वर्ष में राज सिंहासन छोड़ा होगा। 

वी. ए. स्मिथ ने कुमारगुप्त के सिक्कों से पता लगाया है कि उसने 455 ईसवी तक शासन किया था। कुमारगुप्त प्रथम के राज्य के अंतिम वर्ष शांतिपूर्वक नहीं रहे। उस समय पुष्यमित्र या हूणों ने उसके खिलाफ रोष जताना शुरू कर दिया था और ऐसा माना जाता है कि जिसके कारण उसने (Kumaragupta I) राज्य के कई अंगों पर अधिकार खो दिया।

उत्तराधिकारी स्कंदगुप्त (Successor Skandagupta)

455 ईस्वी में स्कंदगुप्त, गुप्त वंश की राजगद्दी पर बैठा। राजा बनने के तुरंत बाद ही उसे हूणों (मलेच्छ/पुष्यमित्र) के आक्रमण का सामना करना पड़ा। उसने इस युद्ध में हूणों को पराजित कर दिया और उनके क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया।

उसके दादा समुद्रगुप्त के समय में ये क्षेत्र गुप्त वंश के अंग थे जिन्हें हूणों ने अपने कब्जे में ले लिया था। इस जीत के बाद वह अपनी मां से मिलना मिलने गया जिनकी आंखें खुशी के मारे आंसुओं से भर आई थी।

बार-बार पूछे गए प्रश्न (FAQS)

कुमारगुप्त प्रथम कौन था?

कुमारगुप्त प्रथम गुप्त वंश का छठा राजा था जो अपने पिता चंद्रगुप्त द्वितीय तथा दादा समुद्रगुप्त के बनाए हुए साम्राज्य के राज सिंहासन पर बैठा। उसका जन्म 399 ईस्वी में प्राचीन भारत में हुआ था और लगभग 40 वर्षों तक उस ने शासन किया।

स्कंदगुप्त किसका पुत्र था?

कुमारगुप्त प्रथम का एक पुत्र स्कंदगुप्त था जो उसके बाद गुप्त साम्राज्य का सम्राट बना था।

कुमारगुप्त प्रथम के कितने बेटे थे?

कुमारगुप्त प्रथम के 2 बेटे थे – स्कंदगुप्त और पूरुगुप्त। स्कंदगुप्त, गुप्त वंश का अगला सम्राट बना था जिसने हूणों को पराजित करके अपने राज्य के खोए हुए भागों को वापस मिलाकर गुप्त साम्राज्य को विघटन से बचाया।

चंद्रगुप्त द्वितीय के बेटे का नाम क्या था?

कुमारगुप्त प्रथम।

नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत किसने की थी?

संभवतया कुमारगुप्त प्रथम ने ही नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और उसका संचालन किया था। ऐसा माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय को चौथी शताब्दी के शुरुआती दशकों में बनाया गया था।

कुमारगुप्त प्रथम (Kumaragupta I) का इतिहास चौथी शताब्दी का इतिहास है। ऐसा माना जाता है कि उसी ने ही नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई थी।

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